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वैकुण्ठ से प्रभावी और आनन्दप्रद है प्रभु का ब्रज धाम

वैकुण्ठ से प्रभावी और आनन्दप्रद है प्रभु का व्रज धाम ऐश्वर्यपूर्ण व्रज में निवास करनेवाले श्रीभगवान के अवतार के जगह होने से ब्रज ऐश्वर्य से पूर्ण है, यह तो एक साधारण सी बात है । विशेष रहस्य यह है कि अवतारों में और विशेषकर कृष्णावतार में ही श्रीभगवान के दया, क्षमा, सौशील्य, वात्सल्य और भी बहुत सारे भाव और गुण प्रकट होते हैं । परमपद में इन गुणों को प्रकाश पाने का अवसर नहीं मिलता है । भक्तों का दुख देखकर श्रीभगवान का स्वयं दुखी होना या उस दुख को दूर करने की चेष्टा करना इत्यादि दया कहलाता है । ब्रज में तो श्रीभगवान आपकी पीड़ा को नित्य ही समझते हैं । आपके के भक्ति को जानते हैं । आपके भजन को सुनकर आनन्दित होते हैं । प्रसन्न होते हैं । आप सच्चे मन से उनकी भक्ति करते हैं तो आपके दुखों को दूर करते हैं और आप सुख की कामना को प्राप्त करते हैं । इसीलिए हम भक्तों से यही कहना चाहते हैं, भगवत्प्रेमियों से यही कहना चाहते हैं कि हमें क्या पता कि हमने कितने जीव-जन्तुओं को ठेस पहुँचाया है ? किन्तु आप सज्जन तो यही      सोंचेंगे कि हमने तो कभी जीव-जन्तुओं को कष्ट नहीं पहुँचाया है परन्तु नहीं ।...

जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् - अन्वय और व्याख्या । श्रीमद्भागवत मंगलाचरण ।

  जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ते यत्सूरयः । तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ।। (1/1/1) श्रीमद्भागवत महापुराण का मंगलाचरण का प्रथम श्लोक अद्भुत रहस्यों से युक्त है । आइए इस पर विचार करें - य ब्रह्म - वह जो ब्रह्म है, जन्माद्यस्य यतः - जिससे इस जगत की सृष्टि, स्थिति और प्रलय होते हैं, और जो इतरतः - अन्य स्थान (नित्य विभूति वैकुण्ठ) से, अन्वयात् – पीछे से (गुप्त रूप से या परोक्ष रूप से अन्तर्यामी भाव से), अर्थेषु – सासांरिक वस्तुओं में (उस परम अर्थ के लिए उपस्थित वस्तु को अर्थ कहते हैं), अभिज्ञः – जानने वाला है (साक्षी जीवात्मा के रूप में उपस्थित या परम कर्ता है), च – और, स्वराट् - परम स्वतंत्र है, इ – अचरज की बात यह है कि, तेन – उसके द्वारा, हृदा – संकल्प से ही, आदिकवये – आदिकवि ब्रह्माजी के लिए वेदज्ञान दिया गया है, यत्सूरयः –जिसके विषय में (उस परम ज्ञान या भगवद्लीला के बारे में) बड़े-बड़े विद्वान भी, मुह्यन्ति – मोहित हो जाते हैं । यथा –जैसे, त...

राधा अष्टमी की बहुत बहुत शुभकामनाएं

गणेश चतुर्थी : गणेश जन्म-विवाह की कथा और उनके पूजन की महिमा ।

  गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम् । उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम् ।। गणेशजन्म की कथा एक समय की बात है कि, पार्वती जी जया, विजया आदि अपनी सखियों के साथ कैलाश मैं बैठकर आपस में कुछ चर्चा कर रहीं थीं । उसी समय यह चर्चा चल पड़ी कि यद्यपि नंदी, भृङ्गी आदि गण हमारे ही गण हैं किन्तु वे पूर्णतः शिव की आज्ञा के अधीन हैं । स्वतन्त्र रूप से हमारा कोई गण नहीं है । अतः हे शिवा आपको अपने लिए स्वतंत्र रूप से एक गण की रचना करनी चाहिए । यह चर्चा यहीं समाप्त हो गई । कुछ दिनों बाद एक बार पार्वती जी स्नान कर रहीं थीं तब उन्होंने द्वार पर नन्दी को बिठा रखा था । तभी शिव उन्हें डांटकर भीतर प्रवेश कर गए थे । स्नानक्रीड़ा में संलग्न पार्वती लज्जित हो गईं और तुरन्त उठ गयीं । तब उनके मन में सखियों के द्वारा कही हुई विचार तार्किक जान पड़ी । कुछ ही समय बाद एक बार स्नान करते समय भगवती पार्वती इस विचार को चरितार्थ करने को उद्यत हुईं । उनके मन में यह विचार आने लगा कि मेरा भी कोई अपना सेवक होना चाहिए, जो श्रेष्ठ हो तथा मेरी आज्ञा के बिना रेखामात्र भी इधर से उधर वि...

रोहिणी नक्षत्रोत्सव, कृष्ण जन्मोत्सव की शुभकानाएं

चक्रवर्त्ति सम्राट महाराजाधिराज दशरथ के जीवन-चरित्र की विशेषतायें

ॐ चक्रवर्त्ति सम्राट महाराजाधिराज दशरथ के जीवन-चरित्र की विशेषतायें दशरथ – दशयुक्तः रथो यस्य – दशरथः । जिसके रथ में दशेन्द्रियरूपी घोड़े रहते हैं, वह दशरथ है । जीव ही दशरथ है । ‘ आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।। इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् । ’ (कठोपनिषद-3/3-4) पञ्च कर्मेन्द्रिय, पञ्च ज्ञानेन्द्रिय ही जीव दशरथ के शरीररूपी रथ के घोड़े हैं । बुद्धि सारथी है और मन ही लगाम है । बुद्धि की तीन वृत्तियां होती हैं – सात्त्विक, राजसिक और तामसिक । दशरथजी की भी तीन पत्नियां हैं – कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी । कौशल्या जी सात्त्विकी बुद्धि, सुमित्रा जी राजसिक बुद्धि और कैकेयी जी तामसिक बुद्धि । ‘ विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः । सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ’ ।। (कठोपनिषद-3/9) रथ का रथी जीवात्मा यदि सात्त्विकी बुद्धि (विज्ञान) रूपी सारथी से युक्त और कुशल है, तभी वह रथ को हृदयस्थल तक ले जाता है और रथी कृतकृत्य हो जाता है । तब वह उस परम पद की प्राप्ति कर लेता है । महाराज दशरथ ने जन्मोत्सव के समय अपने साथ-स...

श्रीरामचरितमानस के सिद्ध दोहा- चौपाई

श्रीरामचरितमानस के सिद्ध दोहा-चौपाई (1)    जल वर्षा – सोइ जल अनल अनिल संघाता । होई जलद जग जीवन दाता ।। (2)    विघ्न नाश – सकल विघ्न व्यापहि नहिं तेही । राम सुकृपा बिलोकहिं जेही ।। (3)    विपत्ति के नाश – राजीव नयन धरें धनु सायक । भगत बिपति भंजन सुखदायक ।। (4)    विषनाश – नाम प्रभाउ जान सिव नीको । कालकूट फलु दीन्ह अमीको ।। (5)    विषयवृत्तिभंग – मन करि बिषय अनल बन जरई । होई सुखी जौं एहि सर परई ।। (6)    करतब नाश – मायापति सेवक सन माया । करइ तो उलटि परइ सुरराया ।। (7)    सुख-सम्पत्ति – जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं । सुख संपति नाना बिधि पावहिं ।। (8)    दुष्ट दलन – जो अपराधु भगत कर करई । राम रोष पावक सो जरई ।। (9)    दुष्ट से मिलाप – गरल सुधा रिपु करहिं मिताई । गोपद सिंधु अनल सितलाई ।। (10)   रक्षा – मामभिरक्षय रघुकुलनायक । धृत बर चाप रुचिर कर सायक ।। अथवा मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ । एहि अवसर सहाय सोइ होऊ ।। (11)   मुकदमा अथवा रण जीतना - रि...