✍️ प्रपत्ति (शरणागति) के तीन अधिकारी होते हैं- लोकाचार्य स्वामी श्रीवचनभूषणम् में इस पर विशेष प्रकाश डालते हैं (1) अज्ञानी - अज्ञानियों में ज्ञान और भक्ति की बहुत कमी रहती है। अतः वे शरणागति के सिवा दूसरा कोई मार्ग जानते ही नहीं हैं। स्वयं में ज्ञान और भक्ति की कमी को स्वीकार किया और ऐसे सभी अज्ञानी को शरणागति को अधिकारी बताया गया है। उदाहरण के लिए केवट, जयन्त नामक कौआ, आदि । ये सभी अज्ञानी होकर भी भगवान की शरणागति प्राप्त कर लेते हैं। (2) ज्ञानी - वेद- वेदांत के ज्ञान से परिपूर्ण आचार्य गण शरणागति के अधिकारी हैं। ज्ञानाधिकों में अज्ञान और भक्ति की अल्पता रहती है। उनमे ज्ञान की प्रचुरता रहती है। शास्त्रों के अध्ययन से उनकी भगवान में अनन्यता सिद्ध हो जाती है। जीव के उद्धार के लिए समस्त विधानों में शरणागति को ही सुलभ और श्रेष्ठ स्वीकार करते हैं। उदाहरण के लिए यामुनाचार्य स्वामीजी, भाष्यकार श्री रामानुज स्वामीजी । अशोक वाटिका में विराजित माता सीता ने हनुमानजी के साथ लंका से निकल चलने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया "त्वां तु पृष्ठगतां कृत्वा सन्तरिष्यामि सागरम्। शक्तिरस्ति हि मे वोढुं लङ्...
#दान #योग्यता एक बार पूरा लेख पढ़ें और कमेंट करें एक बार रात्रि के नौ बजे किसी काम से वृन्दावन में परिक्रमा मार्ग पर किसी आगन्तुक श्रद्धालु की प्रतिक्षा कर रहा था । ठण्ड बहुत जोर की थी । लगभग 5-6 डिग्री । कुछ लोग अलाव लगा कर अग्नि का सेवन कर रहे थे । मुझे भी इसका लाभ ले लेना चाहिये । ऐसा विचार करके, उस ओर बढ़ चला । जलती अग्नि ठण्डक को दूर कर रही थी । उन्हीं मनानुभावों में से किसी ने हमसे एक प्रश्न पूछ लिया कि दान किसे करें ? मैंने उसकी ओर बड़े ही ध्यान से देखा और उसकी कलियुगी जिज्ञासा का रहस्य समझ कर उससे यथोचित उत्तर भी दे दिया । लेकिन यह प्रश्न मेरे मन में बारंबार उठता ही रहा । वास्तविक में यह प्रश्न समसामयिक है और विचारणीय है । यद्यपि दान के ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने स्वयं अपने श्रीमुख से स्पष्ट व्याख्या प्रदान किया है किन्तु सामान्य जनमानस गीता जी के उन रहस्यों को समझ नहीं पा रहा है । समझे भी कैसे, अपनी पेट की आग को मिटाने के चक्कर में उपदेशों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की परम्परा चल पड़ रही है । शास्त्रीय प्रमाणों से दूर भागता धर्माचार्य स्वयं तो व्यग्र और अस्थिर ...